सगुनी का सपना
राजस्थान के पश्चिमी इलाके में एक स्थान है सूरतगढ़। ईप्सा के पापा का स्थानांतरण यहीं के केन्द्रीय कृषि फार्म में हुआ है। ईप्सा को यहाँ के केन्द्रीय विद्यालय में प्रवेश मिल गया।ईप्सा कक्षा पाँच की छात्रा है। दो-चार दिन तो ईप्सा की कक्षा की लड़कियाँ उससेे दूर-दूर रहीं लेकिन बाद में उससे दोस्ती हो गयी। लड़कियों ने ही उसे बताया कि वह अपने टिफिन की सुरक्षा करे। कोई बच्चा खाना चुरा कर खा जाता है।कभी किसी का खाना गायब हो जाता है तो कभी किसी का। बच्चे इस ताक में रहते हैं कि खाना चोर को रँगे हाथ पकड़ा जाये।
मैले -कुचैले कपड़े पहने एक छोटी सी लड़की विद्यालय के तारों की बाउन्ड्री के पास घूमती रहती है। बच्चों ने अनुमान लगाया कि यही खाना चुराती होगी। बच्चों ने अपनी कक्षा की खिड़की में से उसे दूर से कक्षा की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए देखा है। कई बार बच्चों ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो वह भाग गई।
एक दिन इन्टरवल में सभी बच्चे अपनी-अपनी कक्षा से बाहर आकर खेल रहे थे। कुछ अपने दोस्तों के साथ खाना खा रहे थे। तभी तारों की बान्उड्री केे पास बने कूड़ेदान की दीवार से सटी बच्चों की भीड़ को ललचाई दृष्टि से देख रही उस लड़की को किसी बच्चे ने देख लिया।
चार-पाँच बच्चे हाथों में पत्थर लेकर उस लड़की की तरफ दौड़े। बच्चों को अपनी तरफ दौड़ते हुए देख वह भागने को हुई तभी रोहित ने एक पत्थर उस लड़की की ओर फेंका जो उसके माथे पर लगा। पत्थर लगते ही खून का फब्बारा छूटा और वह लड़की बेहोश होकर वहीं गिर पड़ी।
बच्चों की भीड़ जमा हो गई। ईप्सा ने जब भीड़ लगते देखी तो वह भी अपनी सहेलियों के साथ वहाँ पहुँच गई।
"खानाचोर पकड़ी गई..........खानाचोर पकड़ी गई......" - बच्चे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। लड़की बेहोश पड़ी थी और उसके माथे से खून बह रहा था। बच्चे खुश हो रहे थे।
ईप्सा ने जब यह दृश्य देखा तो उससे न रहा गया। जल्दी से वह उस घायल लड़की के पास पहुँच गई। उसने अपने रूमाल से उसका माथा कसकर बाँध दिया और अपनी सहेलियों रानी,दक्षा,अंशु,और गीता से कहा, "आओ! हम सब मिल कर इसे एम.आई.रूम ले चलते हैं।"
गीता कहने लगी- "ईप्सा यह तो खानाचोर लड़की है।बड़ी मुश्किल से तो पकड़ी गई है, और तुम कहती हो कि इसे एम.आई.रूम ले चलो ?"
"गीता यह लड़की खानाचोर है या नहीं, यह बाद में तय होता रहेगा। अभी इसकी जान खतरे में है। इस लिए इसे तुरंत डॉक्टर के पास ले चलते हैं। तुम सब इसे ले चलने में मेरी सहायता करो। इसका खून इसी तरह बहता रहा तो यह बेचारी मर जाएगी।"
बच्चों की भीड़ खून देखकर वहाँ से खिसकने लगी थी। ईप्सा अपनी सहेलियों की सहायता से उस लड़की को डॉक्टर के पास लेकर पहुँची। डॉक्टर ने उसे तुरन्त इन्जेक्शन दिया। उसके माथे का घाव साफ किया। माथा काफी फट गया था।इसलिए डॉक्टर को तीन चार टाँके लगाने पड़े। डॉक्टर ने जब तक उसका उपचार किया तब तक ईप्सा अपनी सहेलियों के साथ वहीं बैठी रही। डॉक्टर ने ईप्सा से कहा- '' ईप्सा! तुम इसे शीघ्र मेरे पास न ले आतीं तो इस गरीब लड़की के जीवन को खतरा हो सकता था। अब यह बिल्कुल ठीक है।मैने इसे दवा दे दी है। एक सप्ताह में इसका घाव ठीक हो जाएगा।
ईप्सा उस लड़की को देखने प्रतिदिन अस्पताल के एम.आई.ऱूम में जाती। वह लड़की हाथ जोड़कर बार-बार कहती कि "मैंने कभी खाना नहीं चुराया। मैं चोर नहीं हूँ।"
'' अगर तुम चोर नहीं हो तो फिर कक्षा के पास खड़े होकर क्या देखती रहती हो? और बुलाने पर भाग क्यों जाती हो? सच-सच बताओ आखिर तुम कौन हो और क्यों रोज आती रहती हो?" - ईप्सा ने उस लड़की से पूछा ।
"दीदी! मेरे बापू बहुत गरीब हैं। पास के गाँव में रहते हैं। मुझे कूड़ा-कचरा, बोतलें, मोमियाँ, आदि बीनने के लिए यहाँं बापू भेजते हैं। मेरा मन कूड़ा-कचरा बीनने में नहीं लगता। मुझे आप सब बहुत अच्छे लगते हो। मेरी भी इच्छा हैं कि मैं भी पढ़ूँ , आप जैसी ड्रेस पहनँू , बैग लेकर स्कूल आऊँ और कुर्सी पर बैठूँ। आप सब को पढ़ते, खेलते देखकर मुझे बहुत सुख मिलता है। इसीलिए मैं तारों के पास खड़ी होकर देखती रहती थी। मैंने चोरी कभी नहीं की।" - लड़की कहते-कहते सपनों में खो गई।
"फिर तुम भाग क्यों जाती थीं?" -ईप्सा ने पूछा।
"मैं डर जाती थी कि मुझे आप लोग पकड़कर मारेंेगे। इसलिए किसी को अपनी ओर आते देखकर मैं भाग जाती थी। . . . . दीदी इस बार आपने मुझे बचा लिया अब मैं कभी नहीं आऊँगी. . . . मुझे क्षमा कर दो ईप्सा दीदी।"- कहकर लड़की सुबक-सुबक कर रोने लगी।
"अरे तुम तो रोने लगीं।..........अच्छा तुम्हारा नाम क्या है?" -ईप्सा ने पूछा।
"सगुनी, सगुनी है मेरा नाम" - लड़की ने कहा।
"तुम्हें जब स्कूल इतना अच्छा लगता है तो फिर एडमीशन क्यों नहीं करवा लेती हो अपने बापू से कहकर"- ईप्सा ने सगुनी से कहा ।
" हुँ हँ! मुझे कौन एडमीशन देगा दीदी ! हम लोग गरीब हैं न, मेरे बापू के पास पैसे नहीं है कि किताबें खरीद सकें और कपड़े बनवा सकें।" -सगुनी ने उदास मन से कहा।
"अच्छा ! सगुनी तुम्हारे लिए किताबें मैं ला दूँगी। मेरी सभी किताबें रखी हैं, उनसे तुम पढ़ लेना"- अंशु बोली। दक्षा कहने लगी कि सगुनी के लिए ड्रेस मैं बनवा दूँगी अपने पापा से कह कर।
डॉंक्टर अजय इन छात्राओं से पहले ही प्रभावित होे चुके थे। इनकी बातें सुनी तो वे अपनी कुर्सी से उठकर लड़कियों के पास आ कर खड़े हो गए। ईप्सा की पीठ थपथपाते हुऐ बोले-" ईप्सा तुम तो बहुत अच्छी बेटी हो। सगुनी को तुम लोग पढ़ाना चाहती हो,यह बहुत अच्छी बात है। जब तुम लोग ड्रेस और किताबों की व्यवस्था कर रही हो तो फिर सगुनी के एडमीशन का तथा शेष खर्च का जिम्मा मैं लेता हूँ।" -डॉक्टर अजय की बात सुनकर लड़कियाँ खुशी से झूम उठीं। सगुनी के चेहरे पर खुशी छा गई। उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि वह भी केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ सकेगी।
डॉक्टर अजय ने कहा, "सगुनी जैसी अनेक बालिकाएँ हैं जो पढ़ना चाहती हैं पर अभाव के कारण पढ़ने से वंचित रह जाती हैं। और हम सब बड़े लोग इन्हें उपेक्षा और घृणा की दृष्टि से देखते रहते हैं। हम कुत्तों को तो अपनी कारों में घुमाने के लिए लालायित रहते हैं पर सगुनी जैसी बच्चियों की थोड़ी सी सहायता करने में कतराते हैं। ईप्सा! तुमने और तुम्हारी सहेलियों ने सगुनी के बारे में जो सोचा है उसे पूरा करने में मैं तुम्हारी पूरी सहायता करूँगा।"
ईर्प्सा को महसूस हो रहा था कि उसने कुछ अच्छा कार्य किया है। डॉक्टर अजय ने अपनी देख-रेख में सगुनी का एडमीशन करा दिया। सगुनी नई ड्रेस पहनकर विद्यालय आयी तो उसे लग रहा था कि दुनिया भर की खुशी उसे मिल गई है।
स्कूल ड्रेस में सजी-धजी सगुनी को प्रार्थना सभा में सावधान विश्राम करते देखकर ईप्सा की आँखों में खुशी के आँसू छलछला आये।
ईप्सा सोच रही थी कि उस जैसे छोट-छोटे बच्चे भी किसी सगुनी के सपनों को साकार करने में उसकी सहायता कर सकते हैं।
ईप्सा के रोम-रोम से खुशी झलक रही थी।
मैले -कुचैले कपड़े पहने एक छोटी सी लड़की विद्यालय के तारों की बाउन्ड्री के पास घूमती रहती है। बच्चों ने अनुमान लगाया कि यही खाना चुराती होगी। बच्चों ने अपनी कक्षा की खिड़की में से उसे दूर से कक्षा की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए देखा है। कई बार बच्चों ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो वह भाग गई।
एक दिन इन्टरवल में सभी बच्चे अपनी-अपनी कक्षा से बाहर आकर खेल रहे थे। कुछ अपने दोस्तों के साथ खाना खा रहे थे। तभी तारों की बान्उड्री केे पास बने कूड़ेदान की दीवार से सटी बच्चों की भीड़ को ललचाई दृष्टि से देख रही उस लड़की को किसी बच्चे ने देख लिया।
चार-पाँच बच्चे हाथों में पत्थर लेकर उस लड़की की तरफ दौड़े। बच्चों को अपनी तरफ दौड़ते हुए देख वह भागने को हुई तभी रोहित ने एक पत्थर उस लड़की की ओर फेंका जो उसके माथे पर लगा। पत्थर लगते ही खून का फब्बारा छूटा और वह लड़की बेहोश होकर वहीं गिर पड़ी।
बच्चों की भीड़ जमा हो गई। ईप्सा ने जब भीड़ लगते देखी तो वह भी अपनी सहेलियों के साथ वहाँ पहुँच गई।
"खानाचोर पकड़ी गई..........खानाचोर पकड़ी गई......" - बच्चे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। लड़की बेहोश पड़ी थी और उसके माथे से खून बह रहा था। बच्चे खुश हो रहे थे।
ईप्सा ने जब यह दृश्य देखा तो उससे न रहा गया। जल्दी से वह उस घायल लड़की के पास पहुँच गई। उसने अपने रूमाल से उसका माथा कसकर बाँध दिया और अपनी सहेलियों रानी,दक्षा,अंशु,और गीता से कहा, "आओ! हम सब मिल कर इसे एम.आई.रूम ले चलते हैं।"
गीता कहने लगी- "ईप्सा यह तो खानाचोर लड़की है।बड़ी मुश्किल से तो पकड़ी गई है, और तुम कहती हो कि इसे एम.आई.रूम ले चलो ?"
"गीता यह लड़की खानाचोर है या नहीं, यह बाद में तय होता रहेगा। अभी इसकी जान खतरे में है। इस लिए इसे तुरंत डॉक्टर के पास ले चलते हैं। तुम सब इसे ले चलने में मेरी सहायता करो। इसका खून इसी तरह बहता रहा तो यह बेचारी मर जाएगी।"
बच्चों की भीड़ खून देखकर वहाँ से खिसकने लगी थी। ईप्सा अपनी सहेलियों की सहायता से उस लड़की को डॉक्टर के पास लेकर पहुँची। डॉक्टर ने उसे तुरन्त इन्जेक्शन दिया। उसके माथे का घाव साफ किया। माथा काफी फट गया था।इसलिए डॉक्टर को तीन चार टाँके लगाने पड़े। डॉक्टर ने जब तक उसका उपचार किया तब तक ईप्सा अपनी सहेलियों के साथ वहीं बैठी रही। डॉक्टर ने ईप्सा से कहा- '' ईप्सा! तुम इसे शीघ्र मेरे पास न ले आतीं तो इस गरीब लड़की के जीवन को खतरा हो सकता था। अब यह बिल्कुल ठीक है।मैने इसे दवा दे दी है। एक सप्ताह में इसका घाव ठीक हो जाएगा।
ईप्सा उस लड़की को देखने प्रतिदिन अस्पताल के एम.आई.ऱूम में जाती। वह लड़की हाथ जोड़कर बार-बार कहती कि "मैंने कभी खाना नहीं चुराया। मैं चोर नहीं हूँ।"
'' अगर तुम चोर नहीं हो तो फिर कक्षा के पास खड़े होकर क्या देखती रहती हो? और बुलाने पर भाग क्यों जाती हो? सच-सच बताओ आखिर तुम कौन हो और क्यों रोज आती रहती हो?" - ईप्सा ने उस लड़की से पूछा ।
"दीदी! मेरे बापू बहुत गरीब हैं। पास के गाँव में रहते हैं। मुझे कूड़ा-कचरा, बोतलें, मोमियाँ, आदि बीनने के लिए यहाँं बापू भेजते हैं। मेरा मन कूड़ा-कचरा बीनने में नहीं लगता। मुझे आप सब बहुत अच्छे लगते हो। मेरी भी इच्छा हैं कि मैं भी पढ़ूँ , आप जैसी ड्रेस पहनँू , बैग लेकर स्कूल आऊँ और कुर्सी पर बैठूँ। आप सब को पढ़ते, खेलते देखकर मुझे बहुत सुख मिलता है। इसीलिए मैं तारों के पास खड़ी होकर देखती रहती थी। मैंने चोरी कभी नहीं की।" - लड़की कहते-कहते सपनों में खो गई।
"फिर तुम भाग क्यों जाती थीं?" -ईप्सा ने पूछा।
"मैं डर जाती थी कि मुझे आप लोग पकड़कर मारेंेगे। इसलिए किसी को अपनी ओर आते देखकर मैं भाग जाती थी। . . . . दीदी इस बार आपने मुझे बचा लिया अब मैं कभी नहीं आऊँगी. . . . मुझे क्षमा कर दो ईप्सा दीदी।"- कहकर लड़की सुबक-सुबक कर रोने लगी।
"अरे तुम तो रोने लगीं।..........अच्छा तुम्हारा नाम क्या है?" -ईप्सा ने पूछा।
"सगुनी, सगुनी है मेरा नाम" - लड़की ने कहा।
"तुम्हें जब स्कूल इतना अच्छा लगता है तो फिर एडमीशन क्यों नहीं करवा लेती हो अपने बापू से कहकर"- ईप्सा ने सगुनी से कहा ।
" हुँ हँ! मुझे कौन एडमीशन देगा दीदी ! हम लोग गरीब हैं न, मेरे बापू के पास पैसे नहीं है कि किताबें खरीद सकें और कपड़े बनवा सकें।" -सगुनी ने उदास मन से कहा।
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ईप्सा सोच रही थी कि उस जैसे छोट-छोटे बच्चे भी किसी सगुनी के सपनों को साकार करने में उसकी सहायता कर सकते हैं।
ईप्सा के रोम-रोम से खुशी झलक रही थी।
-(डॉ॰ जगदीश व्योम)
3 Comments:
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